*आयुर्वेद शिक्षा : परंपरा से आधुनिकता की ओर*
*5 सितम्बर, शिक्षक दिवस* केवल एक स्मरण दिवस नहीं, बल्कि शिक्षा और शिक्षकों की भूमिका पर विचार करने का अवसर है। आज जब पूरी दुनिया आयुर्वेदऔर समग्र स्वास्थ्य की ओर रुख कर रही है, तब आयुर्वेद शिक्षा का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।
*गुरु-शिष्य परंपरा की धरोहर*
आयुर्वेद शिक्षा का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है। *चरक, सुश्रुत और वाग्भट* जैसे महान आचार्यों ने चिकित्सा ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण कला सिखाई। गुरु-शिष्य परंपरा में शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि आचरण और जीवनशैली से भी सीखी जाती थी।
*बदलता परिदृश्य*
आज आयुर्वेद शिक्षा *स्नातक से लेकर स्नातकोत्तर और शोध कार्यों* तक फैली हुई है। देश-विदेश में इसकी उपयोगिता बढ़ रही है। परंतु चुनौतियाँ भी हैं—*व्यावहारिक प्रशिक्षण*, *अंतरराष्ट्रीय मानकीकरण* और *एविडेंस-बेस्ड रिसर्च* की दिशा में और काम करने की आवश्यकता है।
*आयुर्वेद में शिक्षक की अहम भूमिका*
आयुर्वेद शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन समझाने वाले मार्गदर्शक होते हैं। वे विद्यार्थी को शारीरिक, मानसिक और नैतिक रूप से तैयार करते हैं। आज उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है कि वे *पारंपरिक ज्ञान* और *आधुनिक विज्ञान* के बीच सेतु बनें।
*भविष्य की दिशा*
डिजिटल शिक्षा, वर्चुअल लैब्स और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से आयुर्वेद शिक्षा को वैश्विक स्तर पर नई ऊँचाइयों तक ले जाया जा सकता है। आने वाले समय में भारत दुनिया का *स्वस्थ गुरू* बन सकता है, बशर्ते हम शिक्षा और शिक्षकों की भूमिका को समझें और सशक्त करें।
👉 शिक्षक दिवस पर यह संकल्प लेना आवश्यक है कि हम आयुर्वेद शिक्षा को परंपरा और विज्ञान दोनों के आधार पर आगे बढ़ाएँ, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ स्वस्थ और संतुलित जीवन का मार्ग पा सकें। आयुर्वेद शिक्षा में यदि हम अपने शिक्षकों के आदर्शों और मार्गदर्शन को आत्मसात करें तो भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को स्वास्थ्य और जीवन-दर्शन की नई दिशा मिल सकती है।
*डॉ. मनीष कुमार शर्मा*
असिस्टेंट प्रोफेसर, क्रिया शारीर विभाग
डॉ सर्वेश कुमार शुक्ला आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज ,बहराइच, उत्तर प्रदेश












